Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 38, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
महाचिदात्मनैवास्ति जलानिलधराश्मतम् ।
नैतेषु स्पन्दबुद्ध्यादि प्राणजीवाद्यभावतः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
योंद्रष्टा ओर दृश्य जब चेतनरूप प्रिद्ध हुए, तब द्ृश्यात्यक जयत् मे एथिवी, कायु, जल आदि
का भेद निकल गया ओर द्रष्टा में स्यन्दन बुद्धि आदि का भेद निकल गया, इस स्थिति में समस्त
जग्रत् की ब्रह्म के साथ एकता ही सिद्ध हो गु यह कहते हैं ।
दृश्यों में जल, वायु, पृथिवी, पत्थर आदि तथा द्रष्टा में जो स्पन्दन, बुद्धि आदि एवं प्राण
जीव आदि भेद हैं, वह महाचेतनरूप से है ही नहीं, क्योंकि महाचेतन में उनका तीनों काल
में अस्तित्व नहीं है