Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 38, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
जगत्तया शान्ततया ब्रह्मसत्तावतिष्ठते ।
पुंस्तया गत एवात्मा रेतोवटकबीजयोः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत्-रूप से एवं सुषुप्ति-प्रलयरूप से ब्रह्मसत्ता ही स्थित है। आत्मा
ही प्रसवशक्ति से आक्रान्त होकर वीर्य और वटबीजरूप में मानों बन गया है अर्थात् सभी भेद ब्रह्म
के विवर्तरूप ही हैं, अतः वे मिथ्या हैं ।