Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 38, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
संकल्पभ्रम एवान्तः पुष्पीभूय जगत्स्थितम् ।
जलावनितलक्लिन्नबीजं कल्प इव द्रुमः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल से भूमितल में आर्द्रं वट आदि का बीज महान् वट आदि
के वृक्षों के रूप में परिणत हो जाता है, वैसे ही हृदय के भीतर संकल्परूप भ्रम ही पहले पुष्प
बनकर फिर बाहर जगत्-रूप फल बनकर स्थित हो जाता है