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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 38, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

यथा तथा स्थितस्यापि यत्र तत्र गतस्य च । द्वैतसंकल्पसंदोहा न सन्त्यधिगतात्मनः ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस किसी तरह की स्थिति करनेवाले तथा जहाँ कहीं जानेवाले आत्मतत्त्ववेत्ता पुरुष को किसी तरह के द्वैत संकल्प होते ही नहीं