Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 38, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
संवित्संवेदनादेव बुद्ध्याद्याकारवत्स्थितम् ।
रूपालोकमनोरूपं जगद्वेत्ति चिदम्बरम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
अहमर्थ का अभाव कैसे 2 इस आशंका पर कहते हैं /
वस्तुतः चिदाकाश ही अपने स्वरूप के अन्यथा ज्ञान से ही बुद्धि आदि के आकार से युक्त हो
स्थित है और वही रूपालोकमनोरूप (बाह्य एवं आभ्यन्तर) जगत् को जानता है