Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 38, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
निर्वासनस्य विरसस्य निरेषणस्य शास्त्रादृते क इव तत्त्वविनोदहेतुः ।
शास्त्रार्थसज्जनमतोऽप्यमलस्य तस्य संवेदनेष्वनभिसंधिमतः स्वरूपम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
उपसहार दशती हैं /
भद्र, जिसकी वासना मिट चुकी है, जिसको वर्तमान भोगों में कुछ रस नहीं रहा ओर
जिससे भावी भोगो की तृष्णा भी निकल गई - एसे विद्वान् के लिए उत्तम शास्त्र के सिवा दूसरा
कौन-सा पदार्थ आत्मसुख में विश्रान्ति देनेवाला हो सकता है ? अर्थात् कोई नहीं । शरीरधारण
तक अंततोगत्वा प्राप्त होनेवाले आवश्यक व्यवहार-काल में उत्तम शास्त्रों का अनुसरण ही
चित्तदोषनिवारण तथा विवेकादि के उद्बोध द्वारा तत्त्वज्ञान में प्रतिष्ठाकारक है । इसलिए
इच्छाशून्य निर्मल तत्त्ववेत्ता का प्रारब्धप्राप्त व्यवहारिक प्रसंगो में वर्णाश्रमोचित आचरण करना
एवं शम-दमादि साधनों में भलीभाँति लगा रहना ही - असाधारण चिह्न है, न कि
यथेष्टाचरण