Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
संजाताकृत्रिमक्षीणसंसृतिप्रत्ययः पुमान् ।
असंकल्पो न संकल्पं वेत्ति तेनासदेव सः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि तत्वज्ञ के ऊपर शाख़ानुस्रण का नियन्त्रण रकक््खा जाय, तो उम्नमें शाखानुसरण का
संकल्प भी उठने लगेगा, ऐसी आशंका कर कहते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जिसे संसार को क्षीण कर देनेवाला सत्य अर्थ का
स्वाभाविक प्रत्यक्ष हो गया है, वह पुरुष शास्त्रीय व्यवहार में भी संकल्परहित होकर ही स्थित रहता
है, क्योंकि तत्-तत् व्यवहारों को अपनी आत्मा समझकर वह ज्ञानवान संकल्प को पृथक् जानता ही
नहीं, ज्ञान के बिना तो किसी का अस्तित्व माना नहीं जा सकता, अतः संकल्पाभास असत् ही है
सर्ग सन्दर्भ
अड़तीसवाँ सर्ग समाप्त ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ आदिकवि श्रीमद्वाल्मीकिमहामुनिप्रणीत श्रीं योगवासिष्ठ महारमायण परमहंस श्रीमद् आनंद बोधैन्द्र सरस्वती प्रणीत “श्रीवासिष्ठ महारामायण' (तात्पर्यप्रकाशाख्यव्याख्यासहित) का हिन्दी अनुवाद निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध उनतालीसवों सर्ग प्रबुद्ध आत्मा में विश्रान्त तत्त्वज्ञानी का जो स्वरूप रहता है उसका तथा जगत् जिस रूप का रहता है, उसका वर्णन।