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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्वासान्म्लानिरिवादर्शे कुतोऽप्यहमिति स्थिता । विदि साऽकारणं दृष्टा नश्यन्त्याशु न लभ्यते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानवान संकल्प नहीं जानता इस उक्ति का विकरण करने के निष (तत्वद्रष्टा में समस्त संकल्प काबीजभ्ूत अहन्ताध्यास भी बाधित हो गया है, इससे भी उसको संकल्प नहीं उठता यह कहते हैं / तत्त्वज्ञान के पहले किसी अनिर्वचनीय कारण से (अविद्या से), दर्पण में श्वास से उत्पन्न मलिनता के सदुश, आत्मा में अहन्ता स्थित थी, परन्तु वह तत्त्वज्ञानी मेँ बिना कारण ही नाश को प्राप्त हो गई । बहुत अन्वेषण करने पर भी वह कहीं प्राप्त नहीं हो रही है