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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

यस्य क्षीणावरणता शान्तसर्वेहतोदिता । परमामृतपूर्णात्मा सत्तयैव स राजते ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

दूसरी बात यह हैँ कि कामना से संकल्प उठते-रहते हैं; वह तो तत्वदर्शी में है नहीं; क्योकि उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो वुकी हैं; यह कहते हैं । जिसके आवरण का स्वरूप क्षीण हो चुका है तथा जिसकी समस्त इच्छाएँ नष्ट हो गई हैं, निरतिशय आनन्दामृत से पूर्ण स्वरूपवाला वह तत्त्ववेत्ता पुरुष केवल निरतिशय आनन्दस्वरूप की सत्ता से ही शोभित होता है