Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 38, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
चिन्मयत्वाद्यदा चेत्यमेति द्रष्टृचितैकताम् ।
तदा दृश्याङ्गयैवैतच्चेत्यते नान्यथा चिता ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यवहारकाल में भी चिति के साथ ऐक्यप्राप्ति के बल से ही विषयों का अस्तित्व और प्रकाशन
होता हैं, किसी दूसरे तरीके से नहीं; यह कहते हैं ।
चिन्मय होने के कारण ही घटादिरूप विषय जब प्रमातारूप चैतन्य के साथ वृत्ति द्वारा एक हो
जाते हैं, तभी दृश्यरूप देहवाली उस चिति के बल से ही इन घट आदि पदार्थों का प्रकाशन होता
है, अन्यथा नहीं