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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verses 12–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verses 12–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 12-14

संस्कृत श्लोक

क्षणाद्योजनलक्षान्तं प्राप्ते देशान्तरे चितः । चेतनेऽयस्य तद्रूपं मार्गमध्ये निरञ्जनम् ॥ १२ ॥ अस्पन्दवातसदृशं खकोशाभासचिन्मयम् । अचेत्यं शान्तमुदितं लताविकसनोपमम् ॥ १३ ॥ सर्वस्य जन्तुजातस्य तत्स्वभावं विदुर्बुधाः । सर्गोपलम्भो गलति तत्रस्थस्य विवेकिनः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

है, उस स्वभाव में स्थित विवेकी का सृष्टिज्ञान चूर -चूर हो जाता है