Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तिवस्तुस्वभावोऽसौ न स्वप्नो न सुषुप्तता ।
न सर्गो न च निर्वाणं सत्यं शान्तमशेषतः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
चुष॒प्ति आदि विभाग भी श्रान्तियूलक ही हैं, इसलिए वह परमार्थ नहीं हो सकता, यह कहते हैं /
यह स्वप्न, सुषुप्ति आदि विभाग भी भ्रान्ति का ही एक स्वभाव है, इसलिए न तो स्वप्न, न सुषुप्ति,
न सृष्टि और न मुक्ति ही है, किन्तु अशेष विभागों से शान्त परब्रह्म ही असली तत्त्व है