Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तिस्त्वसन्मात्रमयी प्रेक्षिता चेन्न लभ्यते ।
शुक्तिरूप्यमिवासत्यं किल संप्राप्यते कथम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्नादि क्यों नहीं हैं; इस पर कहते हैं
जो भ्रान्ति है उसका असली स्वरूप असदात्मक ही है, विचार करने पर यदि उसका सीपी में
चाँदी के सदुश लाभ नहीं होता, तो स्वप्नादि असत्य पदार्थ कैसे प्राप्त किये जा सकते हैं ?