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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

यन्न लब्धं च तन्नास्ति तेन भ्रान्तेरसंभवः । स्वभावादुपलम्भोन्यो नास्ति कस्य न कस्यचित् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रान्ति का अर्थ यद्यपि श्रान्ति से भले ही न आप्त किया जा सकता हो, परन्तु दूसरे किसी उपलम्भ से तो प्राप्त किया जा सकता है, इस पर कहते हैं / जो किसी काल में लब्ध नहीं होता वह है ही नहीं, इसलिए भ्रान्ति का तीनों काल में अस्तित्व नहीं है। भ्रान्ति का अर्थ भ्रान्तिभिन्न किसी अन्य उपलम्भ (ज्ञान) से प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा उपलम्भ प्रमारूप ही होगा, परन्तु वह किसी भ्रान्तिविषय अर्थ के साक्षी के स्वभाव को छोड़कर दूसरा नहीं हो सकता