Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
अस्वभावे महद्दुःखं स्वभावे केवलं शमः ।
इति बुद्ध्या विचार्यान्तर्यदिष्टं तद्विधीयताम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उसको स्वभावभिन्न मानना ही संसारकूप दु:ख है और कल्पनाराहित अपनी आत्मा में स्थित
रहना मोक्षरूप छुख हैं, यह कहते हैं ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, साक्षिस्वभाव से अतिरिक्त की कल्पना करने पर ही संसारात्मक महान्
दुःख है और साक्षिस्वभाव में निरन्तर स्थिति रखना मोक्षरूप सुख है । इसलिए आप अपनी बुद्धि
से अपनी आत्मा में विचारकर जिसे अपना इष्ट समझें, उसे ग्रहण करें