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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

आत्मस्थादहमित्यादिरस्मदादेरसंसृतेः । शब्दोऽर्थभावमुक्तो यः पटहादिषु जायते ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

अथव्यवहार के सदश शब्दप्रयोग आदि व्यवहार भी आत्मसत्ता से पथक्‌ सत्ता न रखकर ही वेतनाधिष्ठित देह, वाक्‌ आदि सरे होता है, यह कहते हैं / हम लोगों के शरीर, जीभ आदि जड़ होने के कारण किसी तरह का व्यवहार करने के समर्थ नहीं हो सकते, इसलिए उनसे “अहमादि' अर्थों का प्रकाशक जो शब्द जीभ आदि के व्यापार से होगा, वह चेतन से अधिष्ठित जीभ आदि से ही होगा, यह उस तरह मानना चाहिए, जिस तरह नर्तकी के पैरों का संचालन एवं तालों के दृढ़ ज्ञाता वादक पुरुष से अधिष्ठित मृदंग आदि में से शब्द होता है