Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
स्वभावसाधने मोक्षेऽभावोपशमरूपिणि ।
न धनान्युपकुर्वन्ति न मित्राणि न च क्रियाः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
मनुष्यों का बन्धन से जो यह मुक्तिक्रम
है वह तो केवल अपने अधीन है, फिर भी मोह से (अविरुद्ध निरतिशयानन्दात्मा के अपरिज्ञान से
ही) यह संसार पीड़ा उत्पन्न हुई है । आश्चर्य है कि गौ के खुर में ही समुद्र का भ्रम हो रहा है ॥ ३ २॥
असत् दुःखों के उपशमरूप तथा सुखरूप आत्मसाधनभूत मोक्ष में न तो धन उपकार कर सकते हैं
और न मित्र एवं न क्रियाएँ ही कुछ उपकार कर सकती हैं