Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 39, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 39, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
जाग्रति स्वप्नवृत्तान्तस्थितिर्यादृग्रसा स्मृतौ ।
तादृग्रसाहंत्वजगज्जालसंस्था विवेकिनः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान से बाधित हुआ संसार तो स्वप्न की तरह स्मृति की एकमात्र लकीर बन जाता है,
यह कहते हैं /
जाग्रत्काल में स्वप्न में भासित वृत्तान्त की स्थिति जिस तरह की स्मृति रहती है, उसी
तरह की स्थिति विवेकी को भी अज्ञानकाल में भासित अहंकार के साथ समस्त जगत् की
ज्ञानदशा में होती है