Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
अहंभावं नभोर्थेन निर्वाच्यारूढबाणवत् ।
अजस्रमाशु वाऽक्षीणं तिष्ठावष्टब्धतत्पदः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, इस तरह निरन्तर अत्यन्त सावधानी से पैदा किये गये अनहंभाव अहंभाव को शीघ्र
आकाशपुष्प के सदृश निर्वचनीय बनाकर रण में धनुष चढ़ाये गये अर्जुनबाण के सदृश अपरांमुख हो
ब्रह्मरूप लक्ष्य का दृढ अवलम्बन कर निरन्तर आप अवस्थित रहिये