Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
सनभोर्थामहन्तां त्वं चेतन्नेवमनारतम् ।
सर्वभावैरनारूढो भव तीर्णभवार्णवः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रामभद्र, इस रीति से निरन्तर अहन्ता की आकाशपुष्प आदि के सदुश भावना कर रहे
आप समस्त सांसारिक भावनाओं से निर्मुक्त होकर संसारसागर से पार हो जाइये