Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
स्वभावमात्रविजये स्वयं यस्य न वीरता ।
तस्योत्तमपदप्राप्तौ पशोर्ब्रूहि कथैव का ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र,
स्वाभाविक अज्ञानजनित अहंभाव के ऊपर विजय पाने में जिसकी स्वयं वीरता नहीं है उस
पशु की उत्तमपद प्राप्ति के लिए कोई चर्चा ही क्या हो सकती है, यह कहिये