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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

न त्यागः कर्मसंत्यागो बोधस्त्याग इति स्मृतः । अजगत्प्रतिभैकात्मा योऽनहंतादिरव्ययः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

कर्मो का त्याग वस्तुतः त्याग नहीं कहा गया है, बोध ही मुख्य त्याग कहा गया है । जिसमें जगत्‌ का प्रतिभास नहीं है ऐसा परिशिष्ट मुख्य एक आत्मा ही सर्वत्यागरूपी मोक्ष हे, यह अविनाशी तथा अहन्तादि विकारों से रहित है