Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अयं सोहमिदं तन्म इति निःस्नेहदीपवत् ।
शान्ते परमनिर्वाणे प्रबोधात्मेति शिष्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
"पामरजन
तक प्रसिद्ध यह देहादि दृश्य प्रपंच ही मैं हूँ" तथा "देहादि से सम्बध्ध यह भोग्य जगत् मेरा है", इस
तरह के तादात्म्याध्यास और संसर्गाध्यास रूप दो बन्धनों के, तेलरहित दीपक की नाई, समूल
शान्त हो जाने पर सर्वोत्तम बोध ही (एकमात्र चैतन्य ही आत्मा है, इस प्रकार का ज्ञान ही) शेष रह
जाता हे, इसीका नाम परमनिर्वाण यानी मोक्ष हे