Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
परमात्मा तु नोदेति नास्तं याति कदाचन ।
न चास्मादन्यदस्तीति को भावोऽभाव एव वा ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आत्मज्ञान से जीव और जग्रत् की परमात्सरूप अवयवी के रूप में उत्पत्ति आपने मान ली,
तो उसके बाद दूसरे भावविकार भी उत्पन्न होगे ही, ऐसी स्थिति में उन विकारों से तथा जीवभाव,
जयद्भाव एवं उनके ध्वंस आदि को लेकर द्लैतापत्ति भी होगी, इस शंका पर कहते हैं।
वस्तुतः परमात्मा न तो कभी उदित (उत्पन्न) होता है और न कभी अस्त ही ओर जब इस
परमात्मा से भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, तब उससे भिन्न कौन भाव रहा और कौन अभाव
रहा, कहने का तात्पर्य यह कि बाध से कल्पित की जो अधिष्ठानरूपता है, वह न तो उत्पत्तिरूप
है और न नाशरूप है, किन्तु नित्यसिद्ध आत्मरूप है । और विकार आदि में हेतु तो क्रिया ही रहती
है, ज्ञान नहीं, इसलिए जीव की परमात्मरूपता के बाद द्वैत कभी भी नहीं हो सकता