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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

परं परे पूर्णं पूर्णे शान्तं शान्ते शिवं शिवे । इत्येवमात्रं विततं नाहं न च जगन्न धीः ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञान से ज्ञाता, ज्ञेय ज्ञानरूप त्रिपुटी का बाध हो जाने पर त्रिपुटीजनित जीव का विनाश हो जाता है । इससे यही बात निकली कि "त्वं पद का लक्ष्य, पूर्ण, शान्त, शिवस्वरूप परब्रह्म जो "तत्‌ पद के लक्ष्य पूर्ण, शान्त, शिवस्वरूप स्वभाव में पहले से स्थित है, इसीका तत्त्वज्ञान विस्तार कर देता है, अपूर्व किसीका भी उत्पादन नहीं करता