Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
अनिर्वाणे विनिर्वाणं शान्तं शान्ते शिवे शिवम् ।
निर्वाणमप्यनिर्वाणं सनभोर्थं न वापि तत् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
दीप के निर्वाण के समान आभा सहित अविद्या का फल निर्वाण अप्वा ज्ञान का उत्पन्न
हुआ / यह अवश्य ही मानना होगा, अन्यथा ज्ञान निष्फल हो जायेगा / इस पर कहते हैं /
ठीक है, यद्यपि निर्वाण ज्ञान का फल है तथापि वह अपूर्वं उत्पन्न हुआ यह कहना
अत्यन्त अप्रसिद्ध है, क्योकि अन्धकारशून्य सूर्य में अन्धकारनिवृत्ति के समान प्रपंचशून्य ब्रह्म
में प्रपंच-निवृत्ति और नित्यशान्त में शान्ति कही गयी है । अतः अनर्थ निवृत्तिरूप ज्ञान का
कोई अपूर्वं फल नहीं हुआ । इसी तरह नित्यसिद्ध निरतिशयानन्द शिव में आनन्दप्राप्तिरूप फल
भी कोई अपूर्व पदार्थ नहीं है । इस तरह ज्ञान का फल मानने पर द्वैतापत्ति नहीं आ सकती ।
यदि प्रत्यक् में (जीवात्मा में) बन्ध और ब्रह्म मे आकाशादि पदार्थ सत्य होते, तो उनका निर्वाण
दीपनिर्वाण के समान अपूर्वं होता, लेकिन ऐसा है नहीं । रज्जु में सर्प॑निर्वाण के समान
प्रत्यगात्मा के बन्ध का निर्वाण भी वास्तव में अनिर्वाणरूप ही है । ब्रह्म भी वास्तव में
आकाशादि सत्य पदार्थो से युक्त नहीं रहता, इसलिए उनकी निवृत्ति द्वैत को सिद्ध नहीं कर
सकती