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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

अहमर्थः प्रविसृतः प्रकटीकुरुते जगत् । सद्रूपालोकमननं प्रवृत्त इव वासरः ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

सुमेरु के परभाग में सद्रूप दिन उदित होते ही सद्रूप पदार्थ का प्रकाश और मनन जैसे करता है वैसे ही आत्मा में उदित होते ही यह अहंकार जगत्‌ को प्रकट करता है