Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
प्रवृत्तेन दिनेनार्थः प्रकटीक्रियते यथा ।
असज्जगदहन्त्वेन क्षणान्निर्मीयते तथा ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रारम्भ होते
ही दिन जैसे पदार्थों को प्रकाशित करता है वैसे ही प्रारम्भ होते ही अहंकारभावना क्षण भर
में असत् जगत् का निर्माण कर देती है