Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

अहमित्यर्थदुस्तैललवो ब्रह्मणि वारिणि । प्रसृतो यत्तदाश्वेतत्त्रिजगच्चक्रकं स्थितम् ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मरूपी जल में अहंकाररूपी तेल का बिन्दु पड़ते ही जो चारों ओर फैल जाता है वही शीघ्र यह त्रिलोकीरूपी चक्र बनकर स्थित हो जाता है