Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
विस्मृत्याहं त्वमास्स्व प्रविसृतविभवः पूरिताशेषविश्वो विष्वक्शैलान्तरिक्षक्षितिजलधिमरुन्मार्गरूपोऽमलात्मा ।
स्वस्थः शान्तो विशोकः करणमलकलावर्जितो निष्प्रपञ्चो निःसंचारश्चरात्मा सकलमसकलं चेति सिद्धान्तसारः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण उपदेश चिद्धान्तो का सार संक्षेपत्प से दिखलाते हुए अब उपसंहार करते हैं /
हे श्रीरामजी, सबसे पहले व्यष्टि-अहंभाव को भूलकर चारों ओर से पर्वत, अंतरिक्ष,
पृथिवी, समुद्र, वायु तथा उसके मार्ग आकाशरूप होकर सारे संसार को परिपूर्ण बना करके
अपने विभव का विस्तार करते हुए आप समष्टिभाव से स्थित हो जाइये । तदनन्तर स्थावर-
जंगम सारा संसार ब्रह्मरूप ही है, इस तरह के ज्ञान से समस्त प्रपंचो का बाध करके प्रपंवशून्य,
इन्द्रियो, अन्तःकरण के मलों तथा कलाओं से वर्जित होते हुए स्वस्थ, शान्त, विशोक और
निर्मलात्मा होकर स्थित हो जाइये, क्योकि इस तरह अध्यारोप तथा अपवाद न्याय से निष्प्रपंच
आत्मरूप से अवशिष्ट रह जाना ही सम्पूर्ण वेदान्त सिद्धान्तो का सार है