Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 5, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
स मत्समीपमागत्य कृतोदारनमस्कृतिः ।
मत्पूजितोऽवसरत उवाचेदमनिन्दितम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे रामजी, सबसे पहले मन के सहित इन्द्रियों के स्वभाव को
(विषयों की ओर उन्मुख हो रही प्रवृत्ति को) जीतकर पीछे नित्यानित्य वस्तु के विवेक आदि
साधनों में जो मनुष्य प्रवृत्त होता है उसीके लिए शास्त्र के ओर आचार्य के उपदेश का सारा फल
(&) जड़ पदार्थो की नाई इसमें फलव्याप्ति की अपेक्षा नहीं है, अतः इसके साधन में
अतिसुलभता है, यह इससे दिखलाया गया ।
(४) इससे फल में भी उत्पादन आदि किसी विशेष प्रयत्न की आवश्यकता न होने से
अतिसुलभता दिखलाई गई है ।
शीघ्र सिद्ध होता है, दूसरे के लिए नहीं
सर्ग सन्दर्भ
चौथा सर्ग समाप्त पोचिवों सर्ग जितेन्द्रिय पुरुषों में ही शास्त्रों का उपदेश सफल होता है, अजितेन्द्रियो मे नहीं, इस विषय में भुशुण्ड द्वारा कथित विद्याधर कथा का वसिष्ठजी द्वारा वर्णन ।