Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 5, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
स्वभावमात्रं येनान्तर्न जितं दग्धबुद्धिना ।
तस्योत्तमपदप्राप्तिः सिकतातैलदुर्लभा ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस दग्धबुद्धि ने अपने भीतर विषयों की ओर
दौडनेवाली अपनी इन्द्रियों के स्वभाव को नहीं जीत लिया उसको परमपद की प्राप्ति ऐसे दुर्लभ है,
जैसे बालू में से तेल निकालना दुर्लभ है । तात्पर्य यह है कि बालू निचोडने का श्रम जैसे निष्फल है,
वैसे ही चिरकाल से अभ्यस्त हुए भी, इन्द्रियों के स्वभाव को जीते विना श्रवण, मनन आदि
बिलकुल निष्फल है