Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 5, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
शुद्धेऽल्पोऽप्युपदेशो हि निर्मले तैलबिन्दुवत् ।
लगत्युत्तानचित्तेषु नादर्श इव मौक्तिकम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
शुद्ध निर्मल वस्त्र आदि में तेल विन्दु की नाई शुद्ध विमल चित्तवाले मनुष्य
में थोड़ा भी उपदेश प्रविष्ट हो जाता है ओर साधन चतुष्टय से रिक्त चित्तवालों में ऐसे नहीं प्रविष्ट
हो पाता जैसे दर्पण के भीतर मोती नहीं प्रविष्ट हो पाता