Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 40, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
यथाभूतमिदं सर्वं परिजानाति बोधवान् ।
संशाम्यति च शुद्धात्मा शरदीव पयोधरः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
वह भी उत्तरोत्तर श्रूगिकाओं में क्रमश: द्वैत करे अवर्शन से आगे चलकर बिलकुल प्रशान्त हो
जाता है यह कहते हैं ।
जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष सम्पूर्ण जगत् को यथास्थित ही जानता है। तथा शरत्काल के मेघ के
तुल्य शुद्धात्मा हो बिलकुल शान्त हो जाता है