Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 40, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
स्मृतिस्थः कल्पनस्थो वा यथाख्यातश्च संगरः ।
सदसद्भ्रान्ततामात्रस्तथाहंत्वजगद्भ्रमः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवन्मुक्त ज्ञानी की दृष्टि से द्वैत उत्तरोत्तर निर्वल होता जाता है, यह दो दष्टान्तो से
कहते हैं /
जैसे किसीके कहने पर स्मृति या कल्पना में स्थित युद्ध भासता है वैसे ही विवेकी पुरुष
को सत् ओर असत् की एकमात्र भ्रान्तिरूप अहन्ता आदि जगद्-भ्रम भासता है