Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 40, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
आत्मन्यपि नास्ति हि या द्रष्टा यस्या न विद्यते कश्चित् ।
न च शून्यं नाशून्यं भ्रान्तिरियं भासते सेति ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
जो
भलीभाँति दिखाई दे रही जगत् की माया परमार्थसत्यरूप आत्मा में तथा अत्यन्त असद्रूप शून्य
में नहीं है एवं जिसका द्रष्टा कोई जीव भी नहीं है, ऐसी शून्य ओर अशून्य से विलक्षण यह
भ्रान्ति अनिर्वचनीय ही भासती है