Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 40, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मण्येव पराकाशे रूपालोकमनोमयाः ।
विभ्रमास्तव संजातकल्पाः स्पन्दा इवानिले ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी,
वायु मेँ स्पन्दन की नाई, परम चिदाकाशरूप ही ब्रह्म में ये शब्दार्थादिरूप बाह्य एवं आभ्यन्तर
सब पदार्थ आपमें भी विभ्रमस्वरूप ही उत्पन्न हैं, परमार्थतः वे उत्पन्न नहीं हुए हैं, किन्तु
उत्पन्न हुए-से प्रतीत हो रहे हैं