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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 40, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मात्मा वेत्ति नो सर्गं सर्गात्मा ब्रह्म वेत्ति नो । सुषुप्तो वेत्ति नो स्वप्नं स्वप्नस्थो न सुषुप्तकम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

द्वैत के साथ विद्वेष होने के कारण मुदे द्वैत का अवन हैं, ऐसी कई बात नहीं हैं, किन्तु द्रेतदर्शन और द्वेत का अदर्शन दो एक साथ नहीं हो सकते, यह कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, ब्रह्मस्वरूप में स्थित पुरुष सृष्टि को नहीं जानता और सृष्टि में स्थित पुरुष ब्रह्मस्वरूप को नहीं जानता । जैसे कि सुषुप्त पुरुष स्वप्न को नहीं जानता तथा स्वप्न में स्थित पुरुष सुषुप्ति को नहीं जानता