Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 41, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अकर्तृकर्मकरणमदृश्यद्रष्टृदर्शनम् ।
अरूपालोकमननं स्थितं ब्रह्म जगत्तया ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
अल्यस्वरुप मे निष्ठा होने पर व्यवहारकाल में भी जानी पुरुक को यह सारा जगत् विदेकरसरूय
ही भाता है, यह कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, ब्रह्मरूप में भलीभाँति निष्ठा प्राप्त हो जाने पर ज्ञानी पुरुष को व्यवहारकाल
में जगत्-रूप से स्थित कर्ता, कर्म ओर करण से शून्य दृश्य, दर्शन, और द्रष्टा से रहित तथा बाह्य
ओर आभ्यन्तर विषयों से रहित ब्रह्मरूप ही है