Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 41, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
यथा संकल्पनगरं संकल्पान्नैव भिद्यते ।
तथायं जगदाभासः परमार्थान्न भिद्यते ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे संकल्प
का नगर संकल्प से भिन्न नहीं है, वैसे ही यह जगत् का आभास भी परमार्थरूप परब्रह्म से भिन्न
नहीं है