Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 41, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
चिच्चमत्कारमात्रात्मकल्पनारङ्गरञ्जनाः ।
संख्यातुं केन शक्यन्ते खे जगच्चित्रपुत्रिकाः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
तिजयत्-रृपी नाच रही पुतलियों के रुप में मुख्य आविद्या- स्वभाव का वर्णन करते हैं /
चिति के एकमात्र चमत्कारस्वरूप जीवों में संकल्पात्मक नृत्यमण्डपों में श्रृंगार आदि नाना रसों
से परिपूर्ण जगत्-चित्र की पुतलियाँ चिदाकाश में नाच रही हैं । हे श्रीरामजी, इनकी गणना कौन
कर सकता है ?