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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

चित्तदीपे गते यान्ति भ्रान्तिवद्भान्ति खे स्थिते । रूपालोकमनस्कारसंविदोऽम्बुद्रवोर्मयः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

इस्रीको स्पष्टरूप से कहते हैं । कूटस्थ प्रत्यगात्मारूप आकाश में जो बाह्य और आभ्यन्तर विषयों का प्रकाशन होता है, वह एक तरह से मानों जलरूप द्रव की लहरें है, वे मृगतृष्णा जल की नाई मिथ्या ही भासित होती हैं । चित्तरूपी सूर्य के अस्त हो जाने पर वे भी विलीन हो जाती हैं