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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । चित्तवत्कचनं शान्ते यत्तत्तस्मान्न भिद्यते । अव्याकृतामलतया क्वाऽतः सर्गादिसंभवः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

है । प्रभा ओर आकाश में जैसे कोई प्राणी भेद नहीं दिखा सकता, वैसे ही निर्मल इन दोनों में कोई भी प्राणी भेद नहीं दिखा सकता, ऐसी स्थिति में चिति एवं चित्त का भेद ही कहाँ ?