Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 41, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैव शान्तिघनभावगतं विभाति सर्गोदयेन विगतास्तमयोदयेन ।
व्योमेव शून्यविभवेन गलत्स्वभावलाभं प्रति प्रसभमेव ननु प्रबुद्धे ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, जब तत्त्वज्ञान हो जाता है, तब यह
उदित सृष्टिरूप वस्तु उत्पत्ति-विनाश से रहित हो जाती है यानी तत्त्वज्ञ को उस समय यह भान
होता है कि सृष्टि न तो कभी उत्पन्न हुई और न नष्ट ही हुई । उस दशा में उसे पूर्ण स्वराज्य की
प्राप्ति हो जाती है ओर अकेला आनन्दघन ब्रह्म ही अपने अद्ैतस्वभाव के प्रभाव से भासने लग
जाता है । जैसे आकाश में भ्रमवश प्रतीत हो रहे केशोण्डूक, गन्धर्वनगर, तलमलिनता आदि के
स्वभाव का जब बाध हो जाता है, तब पुरुष को हठात् वह शून्यस्वभाव से भासने लग जाता है, ऐसे
ही यहाँ पर भी समझना चाहिए