Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 41, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अजस्रनाशोत्पादाढ्यमेकरूपमनामयम् ।
अनाशोत्पादमजरमनेकमिव कान्तिमत् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
यह निरन्तर नाश और उत्पत्ति से पूर्ण रहते हुए
भी नाश और उत्पत्ति से वर्जित है, अनेक-सा भासित हो रहा भी एकरूप है यानी अजर, भास्वर
तथा परब्रह्म परमात्मरूप से स्थित है