Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
स्वप्ने जाग्रत्यनग्रस्थोऽप्यसन्नेवास्तिभावनात् ।
भावनोपशमं कृत्वा शिलीभूय यथास्थितम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, भावना को शान्त करके पाषाण के समान
निश्चल होकर तथा चिदेकरस होने से शिला से विलक्षण भीतर के अशिलाभूत यथास्थित आत्म
स्वभाव का अवलम्बन करके एकरूप से स्थित रहिये