Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
अशिलीभूतमेवान्तः स्वभावं सममास्यताम् ।
आविवेकोपहारेण यथाप्राप्तार्थपूजनैः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
उत तरह की स्थिति बनाने के लिए अनुकूल विवेक-कैराग्य आदि साधनो का अभ्या ही
आत्मरूप परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ पूजा है, यह कहते हैं /
हे श्रीरामभद्र, पूर्णविवेकरूप उपहार से पूजनसाधन प्रारब्धप्राप्त अर्थों के द्वारा बोध के लिए
बुद्धिपूर्वक आत्मस्वभावरूप परमेश्वर की पूजा कीजिये