Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
यत्रास्त्यात्मेश्वरस्तत्र मूढः कोऽन्यं समाश्रयेत् ।
सत्सङ्गशमसंतोषविवेकापूजितात्मनः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
पूजन द्वारा प्रसन्न हुआ तटस्थ इश्वर तो इस जीव की श्र, सर्फ आरि आदि से भलीभोति
रक्षा कर सकता हैं, परन्तु कूटस्थ आत्मा भला क्या कर सकता हैं 2 इस आशंका पर कहते है /
सत्संग, शम, सन्तोष और विवेक द्वारा जिसने आत्मा की पूर्ण रीति से पूजा की है ऐसे पुरुष
के लिए शस्त्र, सर्प, विष और अग्नि ये सब शिरीण (सिरस) के फूल बन जाते हैं