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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verses 33–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verses 33–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 33,34

संस्कृत श्लोक

शिरीषकुसुमायन्ते शस्त्राहिविषवह्नयः । देवार्चनतपस्तीर्थदानान्यतिकृतान्यपि ॥ ३३ ॥ भस्मायन्ते निरर्थत्वादविवेकामहात्मनाम् । एतान्यपि विवेकेन क्रियन्ते सफलानि चेत् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

अविवेकियों द्वारा किये यये देवतायूजन आदि सत्कर्मों में अपराध होने की अवश्य संभावना हैं, ऐसी स्थिति में वे निष्कल या अनर्थ देनेवाले हो जाते हैं / दूसरी बात यह है कि उन कर्मो में देश, काल; पात्र, द्रव्य, कर्ता आदि की विशुद्धि तथा उनके परिज्ञान, श्रद्धा, भक्ति, शान्ति आदि की यदि आवश्यकता पड़ जाती है, तो सर्वविध क्लेशों से रहित महाफलवाले आत्मदर्शन में ही उनका उपयोग कर्यो न किया जाय 2 यह कहते हैं । जिनको देश, काल, पात्र आदि का विवेक नहीं है, ऐसे दुरात्माओं द्वारा अत्यधिक किये गये देवपूजन, तप, तीर्थाटन, दान आदि सबके सब तत्त्वशून्य होने के कारण भस्मीभूत हो जाते हैं । इसलिए यदि सब विवेक से सफल किये जाय, तो अपने अन्तःकरण में विवेक की ही स्पष्टरूप से साधना क्यों नहीं की जाय ?