Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
विवेक एव तत्कस्मात्स्फुटमन्तर्न साध्यते ।
यथाभूतार्थविज्ञानाद्वासनोपरमे परे ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह कौन-सा विवेक है, जिसकी आप साधना बतला रहे हैं; इस पर उसे कहते हैं ।/
वास्तविक पदार्थ के विज्ञान के अनन्तर वासना के आत्यन्तिक उच्छेद में जो प्रयत्न है,
वही विवेकशब्द का अर्थ है, यह निष्काम यज्ञ तथा दान किया गया आदि कर्मों से जनित चित्त
(4) देखिये श्रुति क्या कहती है :
अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेध स देवानाम् ।
की प्रसन्नता से ही होता हे । वैराग्य आदि सब साधन रूप ही यह यत्न है